Tuesday, October 18, 2011

First Marathi Poem

मंगळवारचा दिवस म्हणजे दगडूशेठ गणपती
सांगतो आहे ऐका, मी विपुल प्रजापती

सोहम उपाहार गृह म्हणजे मराठमोळी मेजवानी
एकच नारा "जय शिवाजी, जय भवानी"

वांग्याचं भरीत आणि तांदळाची भाकरी
मनात आले आता करावी इथेच नोकरी

ज्वारीची भाकर सोबत शेवेची भाजी
मिरचीच्या ठेच्यानी झोप उडवली माझी

झणझणीत मराठी आहार तोही अस्सल पुणेरी
सीताफळ रबडी सोबत झाली संध्याकाळ सोनेरी.

@@@@ An instant Marathi Poem by Pranit Mhatre and Me @@@@

Monday, October 17, 2011

उसके बदलने का गम नहीं !!!


खुदको इतना बदला है की उसके बदलने का गम नहीं,
अकेले होकर भी अकेले रहनेका अब तो डर नहीं,

उसने नयी ज़िन्दगी अपनाई किसीके बहकावे में आकर,
मैंने नयी ज़िन्दगी स्वीकार की सिर्फ तुम्हारे खातिर,
शुक्रगुजार हु उनका की वोह मुझे छोडके चले गए,
नहीं तो मैं कभी धुंद नहीं पाता खुदकी पहेचान फिर कभी,

खुदको इतना बदला है की उसके बदलने का गम नहीं,
अकेले होकर भी अकेले रहनेका अब तो डर नहीं.

Saturday, August 13, 2011

First ever poem written in Hindi

कितने दिल टूटते हुए देखे,
कितने दिलो को जुड़ते देखा,
कितने दिल टूटते हुए देखे,
कितने दिलो को जुड़ते देखा,
इंसान बदले दिल जुड़ते ही, इंसान बदले दिल टूटते ही,
दिल जुड़ते ही किसीने पाया खुदको किसीमे,
दिल टूटते ही सबने पाया खुदको खुदिमे.

The poem style is inspired from one of my collegue Mayank Goswami. I have become a fan of him since i read his poems on his blog(http://mayankgoswami.blogspot.com)